वैश्विक बाजारवादी शक्तियां विज्ञापन और उपभोग के जरिए बदल रहीं भारतीय समाज की दिशाः कैलाश चंद्र

अनूपपुर, 19 अगस्त । वैश्विक बाजारवादी शक्तियां विज्ञापन, लोकप्रिय संस्कृति और उपभोग की प्रवृत्ति के माध्यम से भारतीय समाज की सोच, जीवनशैली और अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। “कुछ मीठा हो जाए” जैसे विज्ञापन संदेशों के जरिए विदेशी कंपनियां भारतीय बाजार में अपनी पैठ मजबूत करती हैं। लोकप्रिय फिल्म कलाकारों के चेहरों का इस्तेमाल कर उत्पादों के प्रति विश्वसनीयता पैदा की जाती है, जबकि कई बार विज्ञापन करने वाले कलाकार स्वयं उन उत्पादों का सेवन नहीं करते। ऐसे प्रचार से पारंपरिक मिष्ठान्न बाजार और स्थानीय कारोबार भी प्रभावित होते हैं। इसलिए प्रत्येक नागरिक को विज्ञापन देखते समय यह प्रश्न करना चाहिए कि उसके पीछे कौन-सी शक्ति और व्यावसायिक रणनीति काम कर रही है।

यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मध्य क्षेत्र प्रचार प्रमुख कैलाश चंद्र ने बुधवार को इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, अमरकंटक में आयोजित विशेष व्याख्यान में कही। उन्होंने “ग्लोबल मार्केट फोर्सेस (वैश्विक बाजारवादी शक्तियां)” विषय पर विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को संबोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलपति (प्र.) प्रो. अवधेश कुमार शुक्ला ने की।

कार्यक्रम का शुभारंभ भारतमाता एवं मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलन से हुआ। समरस शिक्षक समूह के सदस्यों ने अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन डीन प्रो. विकास सिंह, राष्ट्रीय सचिव, स्वदेशी शोध संस्थान ने किया।

उपनिषद के मंत्र से समझाया बाजारवाद का प्रभाव

कैलाश चंद्र ने अपने उद्बोधन की शुरुआत बृहदारण्यक उपनिषद के मंत्र “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय” से की। उन्होंने कहा कि इस मंत्र का संदेश आज के बाजारवादी वातावरण में भी व्यावहारिक रूप से प्रासंगिक है। असत् से सत् की ओर बढ़ना यानी भ्रामक प्रचार से तथ्य की ओर जाना, तमस् से ज्योति की ओर बढ़ना यानी अंधानुकरण के स्थान पर विवेक अपनाना तथा मृत्यु से अमृत की ओर बढ़ना यानी दिखावटी उपभोग के बजाय स्थायी मूल्यों को अपनाना है।

उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी के लिए यह समझना जरूरी है कि वैश्विक बाजारवादी शक्तियां किस प्रकार कार्य करती हैं और उनका प्रभाव राष्ट्र की अर्थव्यवस्था, संस्कृति तथा आत्मबोध पर किस तरह पड़ता है।

अधिक उपभोग को प्रगति मानने पर उठाए सवाल

कैलाश चंद्र ने कहा कि फिल्मी गीतों, लोकप्रिय संस्कृति और प्रचार रणनीतियों के माध्यम से भारतीय उद्योग जगत को प्रभावित किया जाता है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से भारत की वैश्विक अर्थव्यवस्था में बड़ी हिस्सेदारी रही है। उन्होंने एंगस मैडिसन के आर्थिक आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि उपनिवेशकाल के दौरान भारत की हिस्सेदारी में भारी गिरावट आई।

उन्होंने “डी-डॉलराइजेशन” की दिशा में गंभीर शोध की आवश्यकता बताते हुए शोधार्थियों से रुपये की वैश्विक स्वीकार्यता बढ़ाने के उपाय तलाशने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि ऐसा आर्थिक मॉडल, जिसमें उपभोग जितना अधिक हो, जीडीपी उतनी अधिक मानी जाए, भारतीय जीवन-दृष्टि के अनुरूप नहीं है। भारतीय परंपरा संयम और आवश्यकता आधारित उपभोग को महत्व देती है। उन्होंने ऐसे विकास मापदंड तैयार करने की आवश्यकता बताई, जिनमें पर्यावरणीय संतुलन और जीवन की गुणवत्ता को भी शामिल किया जाए।

वैश्विक सूचकांकों की विश्वसनीयता पर सवाल

उन्होंने ग्लोबल हैप्पीनेस इंडेक्स और ग्लोबल हंगर इंडेक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय सूचकांकों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए। कैलाश चंद्र ने कहा कि भारत ने कोरोना काल में खाद्यान्न सुरक्षा बनाए रखने के साथ कई देशों को गेहूं की आपूर्ति की। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण वैश्विक खाद्यान्न आपूर्ति प्रभावित होने पर भी भारत ने अपनी भूमिका निभाई। ऐसे में भारत की वास्तविक खाद्य सुरक्षा और उत्पादन क्षमता का आकलन किए बिना उसे केवल किसी एक सूचकांक के आधार पर देखना उचित नहीं है।

उन्होंने वैश्विक फार्मा उद्योग की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्न उठाते हुए कहा कि इस क्षेत्र में विभिन्न रोगों और विषाणुओं पर शोध के साथ दवाओं का निर्माण किया जाता है। उन्होंने विद्यार्थियों से वैश्विक शक्तियों की कार्यप्रणाली को समझने और प्रत्येक दावे का विवेकपूर्ण विश्लेषण करने का आग्रह किया।

जनजातीय समाज को भारतीय संस्कृति की मुख्यधारा का अभिन्न अंग बताया

विश्व आदिवासी दिवस के संदर्भ में उन्होंने कहा कि इसका मूल संदर्भ भारत से अलग परिस्थितियों में अन्य देशों के मूल निवासियों पर हुए अत्याचारों और उनके संघर्ष की स्मृति से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि भारत का जनजातीय समाज इसी भूमि का अभिन्न अंग है और वह सदियों से भारतीय समाज-जीवन की मुख्यधारा से जुड़ा रहा है।

शास्त्री के आचरण से नेतृत्व का उदाहरण

पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का स्मरण करते हुए कैलाश चंद्र ने कहा कि खाद्यान्न संकट के समय शास्त्री ने देशवासियों से एक समय का भोजन त्यागने की अपील की थी। उन्होंने पहले स्वयं इसका पालन किया, जिसके कारण जनता ने उनकी अपील को सहज रूप से स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि नेतृत्व जब स्वयं आदर्श प्रस्तुत करता है तो समाज भी त्याग और अनुशासन के लिए तैयार होता है।

उन्होंने कहा कि वैश्विक बाजारवादी शक्तियां मुख्य रूप से भाषा, भूषा, भोजन, भजन, भवन और भ्रमण इन छह आयामों को प्रभावित करती हैं। चलचित्र, विज्ञापन और सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों की पसंद और रुचि बदली जाती है और फिर उसी के आधार पर बाजार तैयार किया जाता है। उन्होंने विद्यार्थियों से स्वदेशी दृष्टि अपनाने तथा भारतीय संस्कृति और अपने “स्व” की रक्षा करने का आह्वान किया।

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