सन्यासियों नेे युवा पीढ़ी को नशे और कुरीतियों से दूर रहने की दी सलाह

हरिद्वार, 16 अगस्त । वेद मंदिर आश्रम में रविवार को आर्य समाज के सन्यासियों की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। बैठक में वेदों के प्रचार-प्रसार, संस्कारवान शिक्षा, नशामुक्ति और सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन सहित युवा पीढ़ी को बेहतर संस्कार देने पर विस्तार से चर्चा की गई। संन्यासियों ने परिवार और समाज में अच्छे संस्कारों को बढ़ावा देने तथा आगामी पीढ़ी को चरित्रवान बनाने पर जोर दिया।

पूर्व कैबिनेट मंत्री स्वामी यतीश्वरानंद ने कहा कि संन्यासी समाज और प्रजा के हितैषी होते हैं। आज आवश्यकता है कि सभी संनासियों को एक मंच पर लाकर उनमें एकरूपता स्थापित की जाए और मानवता के हित में कार्य करने की दिशा में आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि संन्यासियों को गांव-गांव और स्कूलों तक पहुंचकर वेदों का प्रचार करना चाहिए तथा युवाओं को संस्कारवान शिक्षा देने के साथ नशे और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जागरूक करना चाहिए।

स्वामी यतीश्वरानंद ने कहा कि आर्य समाज में युवा संन्यासियों की कमी महसूस की जा रही है। संन्यासियों को आर्य समाज के सिद्धांतों के अनुरूप तैयार कर समाज में फैली विसंगतियों को दूर करने की जिम्मेदारी दी जानी चाहिए, ताकि युवा पीढ़ी भ्रमित होने के बजाय संस्कारवान और चरित्रवान बने। उन्होंने कहा कि इसके लिए ठोस रूपरेखा तैयार करने की आवश्यकता है।

उन्होंने शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त कुरीतियों और मानव मन में पनप रहे भ्रष्टाचार को दूर करने पर भी जोर दिया। कहा कि सरकार जिन निर्णयों को कम समय में ले सकती है, उन्हें लागू कराने के लिए जनता को लंबे समय तक आंदोलन करने की स्थिति नहीं आनी चाहिए। संन्यासियों का चरित्र उत्तम होना चाहिए और उन्हें गुटों में नहीं बंटना चाहिए। युवाओं को केंद्र में रखते हुए शिक्षा, चिकित्सा और उपलब्ध संसाधनों के उपयोग के लिए स्पष्ट नियम तय किए जाने की आवश्यकता है।

स्वामी योगेश्वरानंद ने कहा कि समाज में संस्कारों को फिर से जागृत करने की जरूरत है। परिवार के अच्छे गुण और संस्कार ही आने वाली पीढ़ी के चरित्र का निर्माण करते हैं। उन्होंने गुरुकुल पद्धति की शिक्षा को दोबारा अपनाने पर जोर दिया। बैठक का संचालन करते हुए स्वामी ओमानंद ने कहा कि महापुरुषों की जय बोलने का वास्तविक अर्थ उनके सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारना और उनका आचरण करना है। संन्यासी समाज को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का कार्य करते हैं। उन्होंने कहा कि संन्यासियों को मानसिक गुलामी से भी मुक्त होकर मानवता की भलाई के लिए कार्य करना चाहिए। उन्होंने कहा कि केवल बीमारी का उपचार करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसके मूल कारण को तलाशकर उसे दूर करना भी जरूरी है।

बैठक में स्वामी सुरेंद्रानंद, स्वामी चेतनानंद, भगवान देव, शिव मुनि, प्राणदेव, शुद्ध बोधानंद, सोमानंद, चेतन देव, स्वामी योगेश्वरानंद, कृष्णानंद, मेघानंद, वेदामृतानंद, विशेषानंद, प्रेममुनि, स्वामी भगवानदेव, स्वामी चेतरूप सहित अनेक गणमान्य संन्यासी उपस्थित रहे।

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