पत्रकारिता का धर्म है सच को सामने लाना, दबाव में नहीं झुकना : हर्षवर्धन शाही

गोरखपुर, 30 अगस्त । पत्रकारिता केवल खबर लिखने और उसे प्रकाशित करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की आवाज को सत्ता और व्यवस्था तक पहुंचाने की जिम्मेदारी है। जब व्यवस्था के सामने सवाल खड़े करने से डर पैदा होने लगे, तब पत्रकारिता की असली परीक्षा शुरू होती है। पत्रकार को किसी दबाव, लालच अथवा प्रभाव के आगे झुकने के बजाय तथ्यों की पड़ताल कर सच को सामने लाना चाहिए। यही पत्रकारिता का मूल धर्म है और समाज के प्रति उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी। रविवार को शहीद बंधू सिंह के पैतृक गांव डुमरी खास स्थित मैरेज लॉन में आयोजित ‘वर्तमान पत्रकारिता एवं चुनौतियां’ विषयक संगोष्ठी में वक्ताओं ने पत्रकारिता की इसी भूमिका को प्रमुखता से रेखांकित किया।

पूर्वांचल जर्नलिस्ट प्रेस क्लब उत्तर प्रदेश की ओर से आयोजित संगोष्ठी एवं प्रतिभा सम्मान समारोह में पत्रकारिता के बदलते स्वरूप, डिजिटल मीडिया के बढ़ते प्रभाव, विश्वसनीयता के संकट, सत्ता और मीडिया के रिश्ते तथा पत्रकारों के सामने मौजूद व्यावहारिक चुनौतियों पर गंभीर चर्चा हुई। कार्यक्रम में वक्ताओं ने दो टूक कहा कि समय भले बदल गया हो, तकनीक बदल गई हो और खबरों के प्रसारण का माध्यम बदल गया हो, लेकिन पत्रकारिता का मूल चरित्र नहीं बदलना चाहिए। पत्रकारिता की पहचान उसकी स्वतंत्रता, तथ्यपरकता और विश्वसनीयता से ही होती है।

मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व राज्य सूचना आयुक्त हर्षवर्धन शाही ने कहा कि समय और अनुशासन के साथ काम करने वाला व्यक्ति ही जीवन में सफलता प्राप्त करता है। पत्रकारिता में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। किसी घटना की सूचना मिलते ही उसे खबर बना देना पत्रकारिता नहीं है। खबर के पीछे छिपे तथ्यों को खोजना, उससे जुड़े प्रत्येक पक्ष से बातचीत करना और तमाम दावों की पड़ताल करने के बाद सच्चाई को सामने रखना ही वास्तविक पत्रकारिता है।

उन्होंने कहा कि पत्रकार समाज का पहरेदार है। उसे समाज की आखिरी सीढ़ी पर खड़े उस व्यक्ति तक पहुंचना चाहिए, जिसकी आवाज अक्सर व्यवस्था के गलियारों तक नहीं पहुंच पाती। पत्रकारिता का असली मकसद केवल चर्चित मुद्दों को उठाना नहीं, बल्कि उन समस्याओं को सामने लाना भी है जिन्हें दबा दिया जाता है या जिन पर कोई ध्यान नहीं देता।

हर्षवर्धन शाही ने मौजूदा दौर की पत्रकारिता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज पत्रकारिता के पहरेदार को पालतू बनाने की कोशिशें भी होती हैं और उसी तस्वीर को समाज के सामने प्रस्तुत करने का प्रयास किया जाता है। ऐसे समय में पत्रकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी स्वतंत्र सोच और निष्पक्षता को बचाए रखना है। उन्होंने कहा कि बिना किसी लालच और दबाव के पत्रकारिता करने वाला व्यक्ति भले तत्काल कठिनाइयों का सामना करे, लेकिन लंबे समय में उसकी विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी बनती है।

विशिष्ट वक्ता एवं गोरखपुर जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष रत्नाकर सिंह ने कहा कि बदलते दौर में पत्रकारिता करना पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। पत्रकारिता के इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब पत्रकारों ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सच्चाई को सामने रखने के लिए संघर्ष किया। उस दौर की पत्रकारिता की सबसे बड़ी ताकत उसकी विश्वसनीयता थी।

उन्होंने कहा कि डिजिटल युग ने खबरों की गति कई गुना बढ़ा दी है। अब घटना के कुछ ही क्षणों में सूचना लाखों लोगों तक पहुंच जाती है, लेकिन तेज होने की होड़ में तथ्य पीछे नहीं छूटने चाहिए। पत्रकारिता में सबसे तेज होना महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सबसे विश्वसनीय होना महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता की ताकत आवाज की ऊंचाई में नहीं, बल्कि तथ्यों की गहराई में होती है।

रत्नाकर सिंह ने कहा कि पत्रकारिता का पहला दायित्व सत्ता से सवाल करना है। लोकतंत्र में पत्रकारिता को चौथे स्तंभ का दर्जा इसलिए मिला क्योंकि उससे अपेक्षा की गई कि वह शासन-प्रशासन की नीतियों और फैसलों पर सवाल उठाएगी तथा जनता के हितों की निगरानी करेगी। उन्होंने कहा कि मीडिया हाउसों की अपनी सीमाएं हो सकती हैं, लेकिन पत्रकार को उन सीमाओं के बीच भी अपनी जिम्मेदारी और पत्रकारिता धर्म का निर्वहन करना होगा।

मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के अध्यक्ष अरविन्द राय ने कहा कि पत्रकार बनने के लिए केवल खबर लिखना सीखना पर्याप्त नहीं है। नियम, अनुशासन, तथ्य और पत्रकारिता की मर्यादा को समझना भी जरूरी है। उन्होंने सोशल मीडिया को पत्रकारिता के सामने बड़ी चुनौती बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया के प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन उसकी तेजी के बीच तथ्यात्मकता बनाए रखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया सूचनाओं का त्वरित माध्यम हो सकता है, लेकिन किसी सूचना को प्रमाणित खबर में बदलने के लिए तथ्य और विश्वसनीयता जरूरी है। यही कारण है कि आने वाले समय में भी प्रिंट मीडिया की प्रासंगिकता बनी रहेगी। उन्होंने यूट्यूबरों और डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े लोगों से भी नियम और अनुशासन के दायरे में रहकर पत्रकारिता करने की अपील की।

विशिष्ट वक्ता मनोज कुमार सिंह ने ‘गोदी मीडिया’ शब्द के बहाने मीडिया की स्वतंत्रता और सत्ता से उसके रिश्ते पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक वर्ग पर सत्ता के साथ मिलकर काम करने के आरोप लगते रहे हैं। ऐसे माहौल में समाज के वास्तविक मुद्दे कई बार पीछे छूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि पत्रकार को किसी भी पक्ष का प्रचारक बनने के बजाय जनता के सवालों का प्रतिनिधि बनना चाहिए।

डॉ. दिनेश मणि त्रिपाठी ने पत्रकारिता के विभिन्न पहलुओं पर विचार रखते हुए कहा कि समाज में सकारात्मक बदलाव लाने में पत्रकारिता की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने प्रेस क्लब की ओर से पत्रकारिता और विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के प्रयासों की सराहना की।

संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि आज फर्जी खबर, अधूरी जानकारी, सोशल मीडिया पर वायरल सामग्री और बिना सत्यापन के प्रकाशित होने वाली खबरें पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए बड़ी चुनौती हैं। ऐसे समय में पत्रकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। खबर चाहे छोटी हो या बड़ी, उसके प्रत्येक तथ्य की पुष्टि जरूरी है। एक गलत खबर न केवल किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर सकती है, बल्कि समाज में भ्रम और अविश्वास भी पैदा कर सकती है।

इस अवसर पर गोरखपुर जर्नलिस्ट्स प्रेस क्लब के कोषाध्यक्ष दुर्गेश यादव, रमेश मणि त्रिपाठी, ओपी गुप्ता, डॉ. राम प्रताप विश्वकर्मा, प्रमोद जायसवाल, डॉ. अरविन्द कुमार, राजेश जायसवाल, सर्वेश त्रिपाठी, अजीत यादव, हरेन्द्र द्विवेदी, सुनील सिंह, रामचंद्र शाही सहित प्रेस क्लब के सभी पदाधिकारी, पत्रकार और गणमान्य लोग मौजूद रहे।

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