1857 के गदर में औरैया के वीरों ने अंग्रेजों के छुड़ाए छक्के

औरैया, 13 अगस्त (हि. स.) । उत्तर प्रदेश के औरैया जनपद में वर्ष 1857 का स्वतंत्रता संग्राम देश के इतिहास में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ पहली बड़ी बगावत के रूप में दर्ज है। इस क्रांति की लपटों से औरैया भी अछूता नहीं रहा। जिले के वीर सपूतों ने सिर पर कफन बांधकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा संभाला। भरेह और चकरनगर के राजाओं ने क्रांतिकारियों का साथ देकर अंग्रेजों के सामने बड़ी चुनौती पेश की।

कवि अजय अंजाम बताते है कि 1857 की क्रांति के दौरान चकरनगर के राजा कुंवर निरंजन सिंह और भरेह के राजा रूप सिंह ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। चकरनगर के राजा ने सिकरौली के राव हरेंद्र सिंह के साथ मिलकर इटावा में अंग्रेजों के वफादार कुंवर जोर सिंह और सरकारी अधिकारियों को हटाने की मुहिम शुरू की। दोनों राजाओं ने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के संघर्ष को समर्थन देकर अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी।

क्रांतिकारियों की गतिविधियों में शेरगढ़ घाट की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भरेह के राजा कुंवर रूप सिंह ने यमुना नदी पर नावों का पुल बनवाया। इसमें राजा निरंजन सिंह समेत कई क्रांतिकारी जमींदारों ने सहयोग किया। इसी मार्ग से झांसी के क्रांतिकारी यमुना पार कर 24 जून 1857 को औरैया पहुंचे और अंग्रेजी शासन के प्रमुख केंद्र तहसील पर धावा बोल दिया। इस कार्रवाई से अंग्रेजी हुकूमत में खलबली मच गई।

अंग्रेजी सेना और भरेह-चकरनगर के राजाओं के बीच कई बार संघर्ष हुआ। अगस्त 1857 के अंतिम सप्ताह में अंग्रेजी फौज 18 पाउंड की तोपें लेकर व्यापारियों की नावों के जरिए यमुना के रास्ते भरेह पहुंची और राजा के किले पर हमला करने की तैयारी की। अंग्रेजों की रणनीति को भांपकर राजा रूप सिंह पहले ही किला खाली कर चुके थे। इसके बाद पांच सितंबर को अंग्रेजी सेना ने भरेह के ऐतिहासिक किले को तहस-नहस कर दिया।

अगले दिन छह सितंबर को अंग्रेजों ने भरेह से चकरनगर तक कच्ची सड़क बनाकर चकरनगर किले पर हमला किया और उसे अपने कब्जे में ले लिया। अंग्रेजों ने चकरनगर में स्थायी सैन्य छावनी स्थापित की। राजा निरंजन सिंह की गतिविधियों पर नजर रखने और उन्हें रोकने के लिए सहसों में भी फौजी चौकी स्थापित की गई।

1857 की क्रांति ने यह साबित कर दिया था कि औरैया और आसपास के क्षेत्रों के लोग अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार थे। हालांकि 1858 में अंग्रेज दोबारा अपना शासन स्थापित करने में सफल रहे। इसके बाद अंग्रेजों ने कई रियासतों को जब्त कर लिया और उन्हें अपने समर्थकों के हवाले कर दिया।

आज भी बदहाली का शिकार है भरेह का ऐतिहासिक किला

आजादी के 79 वर्ष बाद भी भरेह का ऐतिहासिक किला बदहाली का शिकार है। जिस किले ने 1857 में अंग्रेजी सेना की तोपों का सामना किया था, उसके संरक्षण की जरूरत महसूस की जा रही है। वरिष्ठ पत्रकार हरेंद्र राठौर का कहना है कि ऐसे ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित कर नई पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम में औरैया के योगदान से परिचित कराया जाना चाहिए।

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