छिन्दवाड़ा : माटी के गणेश में आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश

छिन्दवाड़ा, 18 सितंबर । गणेशोत्सव में आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश देने की अनूठी पहल मध्‍य प्रदेश के छिन्दवाड़ा में देखने को मिल रही है। जिले के युवा फाइन आर्टिस्ट और सनातन संस्कृति के संवाहक पं. स्पंदन आनंद दुबे पिछले 25 वर्षों से बिना किसी सांचे के प्राकृतिक माटी से शास्त्रोक्त गणेश प्रतिमाओं का निर्माण करते आ रहे हैं। वर्ष 2001 से शुरू हुई उनकी यह साधना इस वर्ष रजत वर्ष में पहुंच गई है।

इस अवसर पर उन्होंने दशभुजी आद्यमूर्ति श्री ब्रह्मणस्पति महागणपति की पर्यावरण अनुकूल प्रतिमा तैयार कर स्थापित की है। प्रतिमा निर्माण में प्राकृतिक माटी और रंगों के साथ विभिन्न धार्मिक एवं प्राकृतिक सामग्रियों का उपयोग किया गया है। इसका उद्देश्य धार्मिक परंपरा के साथ पर्यावरण संरक्षण का संदेश देना है।

पं. स्पंदन आनंद दुबे के अनुसार, इस बार गणेश प्रतिमा के निर्माण में पंचामृत, पंचगव्य, पंचपल्लव, पंचरत्न और पंचधातु के अलावा नीमसत्व, कुशा, सप्तकाष्ठ, दूर्वासत्व और बिल्वसत्व जैसी प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल किया गया है।

प्रतिमा निर्माण में जपाकुसुम, समुद्र की रेत, गंगाबालू, तीर्थोदक जल और समुद्रजल के साथ कौड़ी, गुंजा, मूंगा रत्न, शंख-सीप और कपूरजल को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा अर्क की जड़, सप्तमृत्तिका, सप्तधान्य, सर्वौषधि, सप्त लघुनारियल, दक्षिणा, अक्षत, कपूर, फिटकरी और गुलाबजल जैसी सामग्री का भी प्रयोग किया गया है।

इस तरह प्रतिमा निर्माण में इस्तेमाल सामग्री को प्राकृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सामग्री के साथ जोड़ा गया है। प्रतिमा का निर्माण बिना सांचे के हाथों से किया गया है।

पं. दुबे बताते हैं कि माटी से गणेश प्रतिमा बनाने की प्रेरणा उन्हें उनकी मातामही दादी पूज्य गंगा देवी दुबे से मिली। वर्ष 2001 से शुरू हुआ यह क्रम लगातार जारी है। पिछले वर्षों में भी उन्होंने शास्त्रोक्त स्वरूपों में गणेश प्रतिमाओं का निर्माण किया है। इनमें षड्भुजी हेरम्ब और अष्टभुजी महागणपति के स्वरूप प्रमुख रहे हैं।

उनका कहना है कि माटी की प्रतिमा बनाना केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा विषय नहीं है, बल्कि इसके माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी दिया जा सकता है। प्राकृतिक माटी, औषधियों और बीजों से तैयार प्रतिमा के विसर्जन के बाद मिट्टी में मौजूद बीज नए पौधों के रूप में जीवन का संदेश देते हैं।

अनंत चतुर्दशी के अवसर पर हवन-पूजन के बाद श्रीविग्रह का विसर्जन घर-आंगन में ही विशेष विसर्जन पात्र में जलविलय के माध्यम से किया जाएगा। इसके बाद प्राप्त पावन माटी का उपयोग कमल के पौधों के रोपण में किया जाएगा।

इस प्रक्रिया के जरिए प्रतिमा विसर्जन की धार्मिक परंपरा के साथ जल और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी जुड़ता है। प्राकृतिक सामग्री से बनी प्रतिमा के जलविलय के बाद प्राप्त माटी को दोबारा प्रकृति से जोड़ने की यह प्रक्रिया पर्यावरण के प्रति जागरूकता का उदाहरण प्रस्तुत करती है।

पं. दुबे की यह पहल गणेशोत्सव की धार्मिक आस्था को प्रकृति से जोड़ने का प्रयास है। उनका मानना है कि पूजा-पद्धति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर धार्मिक परंपराओं को प्रकृति के अनुकूल बनाया जा सकता है।

माटी से निर्मित श्री ब्रह्मणस्पति महागणपति के इस स्वरूप के दर्शन छिन्दवाड़ा के श्री जगन्नाथ आराधना स्थली, विजय आनंद दुबे के निवास, वर्धमान सिटी, पाठा ढाना, चंदन नगर में किए जा सकते हैं। यहां श्रद्धालुओं को गणेश प्रतिमा के साथ प्राकृतिक सामग्री के प्रयोग और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े इस प्रयास को देखने का अवसर मिल रहा है।

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